रामनगर रामलीला में कार से पहुंचे काशी नरेश, हाथी की घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

वाराणसी: रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला में हाथी के बेकाबू होने की घटना के बाद इस बार काशी नरेश अनंत नारायण सिंह का लीला स्थल पहुंचने का अंदाज बदला हुआ नजर आया। परंपरागत रूप से हाथी पर सवार होकर आने वाले काशी नरेश इस बार कार से पहुंचे। उन्होंने बैठकर रामलीला का मंचन देखा और समापन के बाद आरती में खड़े होकर हिस्सा लिया। उधर, घटना के बाद वन विभाग हाथी की सेहत और उससे संबंधित दस्तावेजों की जांच में जुटा है।

रामनगर की रामलीला में काशी नरेश के पहुंचने के बाद ही मंचन शुरू होने की परंपरा रही है। ऐसे में उनका कार से पहुंचना लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। हाथी से जुड़ी घटना के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु रामलीला देखने पहुंचे और आरती में शामिल हुए।

छह दशक से रामलीला देख रहे दर्शक ने बताया अनुभव

रामनगर की रामलीला को लगभग 60 वर्षों से देख रहे कन्हैया लाल पटेल ने बताया कि जब वह करीब 10 साल के थे, तब अपने बाबा के साथ रामलीला देखने आया करते थे। इतने लंबे समय में उन्होंने बारिश के कारण मंचन रुकते हुए देखा है, लेकिन हाथी की घटना के बाद भी लोगों की आस्था में कमी महसूस नहीं की।

श्रद्धालुओं की मौजूदगी के बारे में उन्होंने कहा कि रामलीला भगवान की लीला है और लोग अपनी श्रद्धा से यहां पहुंचते हैं। इसके लिए उन्हें अलग से बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती। घटना के बाद भी लोग मंचन देखने आए और समापन पर आरती में शामिल हुए।

युद्ध और कोरोना काल में भी प्रभावित हुआ था आयोजन

रामनगर की रामलीला का इतिहास कई दशकों पुराना है। इस दौरान कुछ ऐसे मौके भी आए, जब विशेष परिस्थितियों के कारण मंचन प्रभावित हुआ।

स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान रात में पेट्रोमैक्स जलाने पर प्रतिबंध लगने से आयोजन में परेशानी आई थी। प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण मंचन रोकना पड़ा था।

इसके बाद कोरोना महामारी के दौरान 2020 और 2021 में भी रामलीला का नियमित आयोजन पूरी तरह रोक दिया गया था। सामान्य परिस्थितियों में बारिश के कारण किसी दिन का मंचन स्थगित होने पर संबंधित प्रसंग अगले दिनों में पूरा कराया जाता रहा है।

करीब 50 साल पहले भी बेकाबू हुआ था हाथी

स्थानीय लोगों के मुताबिक, रामनगर में हाथी के बेकाबू होने की घटना पहले भी सामने आ चुकी है। वर्ष 1976-77 के आसपास तत्कालीन काशी नरेश विभूति नारायण सिंह का मंगला प्रसाद नाम का हाथी अचानक बेकाबू हो गया था। उसने रामनगर किले के आसपास तोड़फोड़ शुरू कर दी थी।

बताया जाता है कि हाथी का अपने महावत की तुलना में काशी नरेश से अधिक परिचय और लगाव था। जब हाथी को शांत करने की कोशिश की गई, तो वह आसानी से काबू में नहीं आया। काफी मशक्कत के बाद गोखरू का इस्तेमाल करके उसे नियंत्रित किया गया था।

यह घटना आज भी स्थानीय लोगों के बीच चर्चा में रहती है और हाथियों को संभालने के दौरान सावधानी बरतने की जरूरत की याद दिलाती है।

1999 के आसपास एक हाथी को मारनी पड़ी थी गोली

रामनगर के निवासी सृजन श्रीवास्तव के मुताबिक, वर्ष 1999 के आसपास एक अन्य हाथी ने भी इलाके में काफी उत्पात मचाया था। उसे नियंत्रित करने की लंबे समय तक कोशिश की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली। आखिरकार उसे गोली मारनी पड़ी।

स्थानीय लोगों के अनुसार, बाद में हाथी को पीएसी कैंप में गिरिजा मंदिर के पास दफनाया गया था। उसके भारी वजन को देखते हुए उसी स्थान पर दफनाने का फैसला लिया गया। बताया जाता है कि उस हाथी का काशी राज परिवार से कोई संबंध नहीं था।

पहले रामनगर में हाथियों को रखने के लिए अलग हाथीखाना भी हुआ करता था। इन पुरानी घटनाओं के चलते मौजूदा मामले के बाद हाथियों की देखरेख और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

सामाजिक कार्यकर्ता ने सुरक्षा इंतजामों की जांच की मांग की

हाथी के बेकाबू होने की घटना के बाद सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. अवधेश दीक्षित ने प्रशासन से पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है। उन्होंने जिलाधिकारी, मंडलायुक्त, वन विभाग के अधिकारियों और प्रदेश सरकार को पत्र भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने की अपील की।

डॉ. दीक्षित का कहना है कि रामलीला में हाथियों का इस्तेमाल पुरानी परंपरा का हिस्सा है, लेकिन ऐसे आयोजनों में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था से समझौता नहीं किया जा सकता।

उन्होंने हाथी के स्वास्थ्य, व्यवहार, स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों, ट्रांजिट परमिट और महावत के प्रशिक्षण की जांच कराने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजनों में हाथियों को लाने से पहले जरूरी अनुमतियां, प्रशिक्षित महावत, पशु चिकित्सकों की उपलब्धता और आपातकालीन बचाव व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

उनके मुताबिक, समय रहते सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा करने से भविष्य में किसी बड़े हादसे की आशंका को कम किया जा सकता है।

पीएन कॉलेज के सामने रखा गया हाथी, दिन में दो बार हुई जांच

घटना के बाद हाथी को रामनगर में पीएन कॉलेज के सामने स्थित मैदान में रखा गया है। हाथी के मालिक की ओर से वहां कर्मचारियों की तैनाती की गई है, जबकि वन विभाग की टीम भी उसकी निगरानी कर रही है।

अधिकारियों के अनुसार, दिन में दो बार हाथी के स्वास्थ्य की जांच की गई। वाराणसी की डीएफओ निधि ने बताया कि फिलहाल हाथी की सेहत सामान्य बनाए रखना विभाग की प्राथमिकता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने तक हाथी को आजमगढ़ ले जाने की अनुमति नहीं दी गई है। हाथी के मालिक के लाइसेंस और आयोजन में उसे लाने से संबंधित अनुमति के सवाल पर उन्होंने कहा कि पूरे मामले की जांच की जाएगी।

संबंधित दस्तावेजों और आवश्यक अनुमतियों की स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

परंपरा के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान जरूरी

रामनगर की रामलीला धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इसके मंचन को देखने पहुंचते हैं। ऐसे में आयोजन की परंपराओं को बनाए रखने के साथ श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

हाथी के बेकाबू होने की हालिया घटना के बाद अब उसके स्वास्थ्य, मालिक के दस्तावेजों और सुरक्षा इंतजामों की जांच पर ध्यान दिया जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद ही इस मामले से जुड़े सभी पहलुओं की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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