लंबे सत्ता काल के बाद अग्निपरीक्षा, क्या ‘दीदी’ का असर फिर दिखेगा?

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय बेहद अहम दौर से गुजर रही है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार 15 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं और इतिहास रचने की दहलीज पर खड़ी हैं।
तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो के तौर पर ममता बनर्जी ने लंबे समय तक राज्य की राजनीति पर अपना दबदबा बनाए रखा है। उनके कार्यकाल में वामपंथी दलों का प्रभाव लगभग खत्म हो गया, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी काफी कमजोर हो गई। हालांकि, हाल के वर्षों में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में अपनी पकड़ मजबूत कर खुद को प्रमुख चुनौती के रूप में स्थापित किया है।
‘ब्रांड दीदी’ की असली परीक्षा
इस चुनाव में ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी है। भ्रष्टाचार के आरोप, सत्ता-विरोधी माहौल और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच यह सवाल अहम हो गया है कि क्या ‘ब्रांड दीदी’ एक बार फिर जनता का भरोसा जीत पाएगा।
ममता की राजनीति उनकी सादगी और “मां, माटी, मानुष” के नारे पर आधारित रही है, जिसने उन्हें आम लोगों से गहराई से जोड़े रखा है।
राजनीतिक सफर और उभार
1970-80 के दशक में छात्र राजनीति से शुरुआत करने वाली ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अपने करियर की शुरुआत की। 1984 में वह पहली बार सांसद बनीं और धीरे-धीरे वामपंथ के खिलाफ सबसे मजबूत आवाज बनकर उभरीं।
1997 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की, जो आगे चलकर वामपंथ के खिलाफ मुख्य विकल्प बनी।
सिंगूर से सत्ता तक का रास्ता
2006 का सिंगूर आंदोलन ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। टाटा के नैनो प्रोजेक्ट के खिलाफ किसानों के समर्थन में किए गए इस आंदोलन ने उन्हें राज्यभर में लोकप्रिय बना दिया।
2011: बदलाव की शुरुआत
2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने 34 साल पुरानी वाम सरकार को हटाकर 294 में से 184 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद 2016 और 2021 में भी उन्होंने अपनी जीत दोहराई।
2021 में नंदीग्राम से हार के बावजूद उन्होंने भवानीपुर उपचुनाव जीतकर मुख्यमंत्री पद बरकरार रखा।
निर्णायक मोड़ पर चुनाव
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल का यह चुनाव बेहद निर्णायक माना जा रहा है। एक तरफ बीजेपी सत्ता में आने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है, तो दूसरी ओर ममता बनर्जी अपनी लोकप्रियता और ‘ब्रांड दीदी’ की छवि के सहारे जीत की उम्मीद लगाए हुए हैं। अब देखना यह होगा कि क्या वह एक बार फिर जनता का भरोसा जीतकर सत्ता में वापसी कर पाती हैं या नहीं।
