राजमोहन गांधी ने जंतर-मंतर प्रदर्शन पर रखी राय, कहा- उपवास से समाज और सोच दोनों बदल सकते हैं

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी प्रदर्शन और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन के बीच महात्मा गांधी के पोते एवं इतिहासकार राजमोहन गांधी ने उपवास की परंपरा और उसके उद्देश्य पर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने उपवास का उपयोग केवल सरकार पर दबाव बनाने के लिए नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और लोगों की सोच बदलने के लिए भी किया था।
राजमोहन गांधी ने एक समाचार एजेंसी से बातचीत में बताया कि भूख हड़ताल का इतिहास भारत से पहले आयरलैंड के ब्रिटिश शासन विरोधी आंदोलनों तक जाता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह और जतिन दास ने भी लंबे समय तक भूख हड़ताल कर अपने विरोध को दर्ज कराया था।
उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी ने अपने सार्वजनिक जीवन में सबसे शुरुआती उपवास दक्षिण अफ्रीका में किए थे। बाद में भारत लौटने के बाद उन्होंने विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर कई बार उपवास रखा। उनके अनुसार, गांधीजी के कई उपवासों का उद्देश्य लोगों के बीच सद्भाव बढ़ाना, हिंसा रोकना और विशेष रूप से हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करना था।
राजमोहन गांधी का कहना है कि यदि किसी आंदोलन के दौरान सरकार प्रदर्शनकारियों से संवाद करे, उनकी बात गंभीरता से सुने और समाधान की दिशा में सकारात्मक पहल करे, तो ऐसे मामलों में उपवास समाप्त होने की संभावना बन सकती है।
उधर, जंतर-मंतर पर शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन पिछले कई सप्ताह से जारी है। इसी आंदोलन के समर्थन में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी अनशन पर बैठे थे। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें चिकित्सकीय निगरानी में अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस मामले में अस्पताल बदलने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने उन्हें अन्य अस्पताल में स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया।
इस बीच आंदोलन से जुड़े लोग अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं, जबकि प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था पर लगातार नजर बनाए हुए है।
