रेलवे बोर्ड की अहम बैठक से कई सांसद नदारद, प्रतिनिधियों ने रखीं क्षेत्र की समस्याएं और मांगें

पूर्वोत्तर रेलवे क्षेत्र में यात्री सुविधाओं, ट्रेनों के संचालन और बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर आयोजित महत्वपूर्ण बैठक में बड़ी संख्या में सांसदों की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी रही। बैठक में आमंत्रित 25 सांसदों में से केवल 11 ने स्वयं हिस्सा लिया, जबकि 14 सांसदों ने अपने प्रतिनिधियों को भेजकर उपस्थिति दर्ज कराई।
वाराणसी स्थित पूर्वोत्तर रेलवे मंडल कार्यालय में आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता सांसद राजीव प्रताप रुड़ी ने की। बैठक में रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी भाग लिया और विभिन्न विकास योजनाओं तथा प्रस्तावों पर चर्चा की।
बैठक में शामिल सांसदों और उनके प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों से जुड़े रेलवे संबंधी मुद्दे उठाए। नई ट्रेनों के संचालन, प्रमुख स्टेशनों पर अतिरिक्त ठहराव, रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज निर्माण, अंडरपास की समस्याओं के समाधान और यात्री सुविधाओं में सुधार जैसे विषय प्रमुख रहे।
कई जनप्रतिनिधियों ने कोरोना काल के दौरान बंद किए गए ट्रेनों के ठहराव को पुनः शुरू करने की मांग की। साथ ही वाराणसी-लखनऊ शटल सेवा को कानपुर तक विस्तार देने का प्रस्ताव भी रखा गया। यात्रियों की सुविधा के लिए स्टेशनों पर स्वच्छ पेयजल, बेहतर शौचालय और महिला यात्रियों के लिए सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की मांग भी सामने आई।
छपरा, गाजीपुर, जौनपुर, चंदौली, आजमगढ़, बलिया और अन्य जिलों के जनप्रतिनिधियों ने अपने क्षेत्रों से जुड़े रेलवे विकास कार्यों और नई परियोजनाओं पर सुझाव दिए। कुछ सांसदों ने नई ट्रेनों के संचालन और लंबी दूरी की एक्सप्रेस ट्रेनों के अतिरिक्त ठहराव की आवश्यकता पर जोर दिया।
बैठक के दौरान रेलवे अधिकारियों ने बीते वित्त वर्ष में किए गए कार्यों का ब्यौरा भी प्रस्तुत किया। अधिकारियों के अनुसार कई रेलखंडों में मल्टी-ट्रैकिंग, ऑटोमेटिक सिग्नलिंग और समपार फाटकों के आधुनिकीकरण का कार्य पूरा किया गया है। त्योहारों और विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में स्पेशल ट्रेनों का संचालन भी किया गया।
रेलवे प्रशासन ने बताया कि क्षेत्र के कई स्टेशनों का पुनर्विकास कार्य अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत तेजी से चल रहा है। कुछ स्टेशनों का काम पूरा हो चुका है, जबकि कई प्रमुख स्टेशनों के विकास कार्य अगले कुछ महीनों में पूरे होने की संभावना है।
बैठक में सांसदों की कम उपस्थिति को लेकर भी चर्चाएं होती रहीं। हालांकि प्रतिनिधियों ने अपने क्षेत्रों की समस्याओं और मांगों को विस्तार से रखा, लेकिन कई लोगों का मानना था कि ऐसे महत्वपूर्ण मंच पर जनप्रतिनिधियों की प्रत्यक्ष भागीदारी अधिक प्रभावी साबित हो सकती थी।
