अयोध्या में इंद्रध्वज मंडल विधान का खास आयोजन, स्वर्ण जयंती समारोह में उमड़ा भक्तों का सैलाब

अयोध्या: रायगंज स्थित जैन मंदिर में इन दिनों 10 लक्षण महापर्व के चलते धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियां चल रही हैं। इसी क्रम में यहां इंद्रध्वज मंडल विधान के 50 वर्ष पूरे होने पर स्वर्ण जयंती समारोह का आयोजन किया जा रहा है। विशेष धार्मिक अनुष्ठान में देश के अलग-अलग राज्यों से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं और तप, पूजा, स्वाध्याय तथा साधना में हिस्सा ले रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, असम, मध्य प्रदेश समेत करीब एक दर्जन राज्यों से श्रद्धालुओं के पहुंचने के कारण मंदिर परिसर में विशेष आध्यात्मिक माहौल बना हुआ है। दस दिवसीय महापर्व के दौरान श्रद्धालु क्रमवार दस धर्मों की आराधना कर आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का प्रयास कर रहे हैं।

उत्तम तप धर्म का बताया महत्व

10 लक्षण महापर्व के दौरान मंगलवार को श्रद्धालुओं ने उत्तम तप धर्म की आराधना की। जैन साध्वी आर्यिका चंदनमती माता ने तप के महत्व को समझाते हुए कहा कि तप का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं है। वास्तविक तप मनुष्य की इच्छाओं, विकारों और विषय-वासनाओं पर नियंत्रण पाने की साधना है।

उन्होंने कहा कि तप के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की अशुद्धियों को कम करने और आत्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करता है। जब जीवन में संयम और तप का भाव कमजोर पड़ता है तो व्यक्ति का आध्यात्मिक पतन शुरू हो सकता है। ऐसे में आत्मशुद्धि के लिए तप धर्म की साधना महत्वपूर्ण मानी गई है।

1976 में शुरू हुई थी इंद्रध्वज मंडल विधान की परंपरा

आर्यिका चंदनमती माता ने इंद्रध्वज मंडल विधान की परंपरा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इसका शुभारंभ 1976 में गणिनी प्रमुख माता ज्ञानमती द्वारा किया गया था।

इस धार्मिक विधान को शुरू हुए 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इस साल मंदिर परिसर में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। स्वर्ण जयंती वर्ष के तहत श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक गतिविधियों में भाग ले रहे हैं।

दस दिनों की साधना के बाद होता है क्षमावाणी पर्व

जैन मंदिर के पीठाधीश रवींद्रकीर्ति स्वामी ने बताया कि 10 लक्षण महापर्व की शुरुआत उत्तम क्षमा धर्म से होती है। इसके बाद प्रत्येक दिन एक-एक धर्म की आराधना की जाती है और दस दिनों की साधना के बाद क्षमावाणी पर्व के साथ इसका समापन होता है।

उन्होंने कहा कि यह पर्व व्यक्ति को कुछ समय के लिए सांसारिक व्यस्तताओं से अलग होकर अपने जीवन और कर्मों पर विचार करने का अवसर देता है। दस धर्मों की साधना के जरिए संयम, सदाचार और अच्छे कर्मों की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

रवींद्रकीर्ति स्वामी के अनुसार, पर्व के दौरान श्रद्धालु जाने-अनजाने में किए गए पापकर्मों से दूर रहने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं। यही इस धार्मिक साधना का मूल उद्देश्य माना जाता है।

राम मंदिर निर्माण से भी जुड़ा पुराना प्रसंग

कार्यक्रम के दौरान पूर्व न्यायमूर्ति कैलाश चंद्र चांदीवाल ने इंद्रध्वज मंडल विधान से जुड़ा एक पुराना प्रसंग भी साझा किया। उनके अनुसार, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर बाधाओं का दौर चल रहा था। उस समय विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष अशोक सिंघल ने माता ज्ञानमती से मुलाकात कर परिस्थितियों की जानकारी दी थी।

चांदीवाल के मुताबिक, इसके बाद माता ज्ञानमती ने अपने अनुयायियों को आवश्यक निर्देश दिए और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की बाधाओं को दूर करने के उद्देश्य से भी इस विधान का आयोजन कराया गया था।

धार्मिक परंपराओं के संरक्षण पर जोर

लखनऊ सराफा एसोसिएशन के पदाधिकारी आदेश जैन ने कहा कि अयोध्या का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यह नगरी ज्ञान, साधना और विभिन्न धार्मिक परंपराओं की समृद्ध विरासत के लिए भी जानी जाती है।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं से जुड़ी विरासत को सुरक्षित रखना और उसके बारे में नई पीढ़ी को जानकारी देना समाज की जिम्मेदारी है।

नागालैंड से भी पहुंचे श्रद्धालु

नागालैंड से कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे रवि सेठी ने इंद्रध्वज मंडल विधान को अपने लिए आध्यात्मिक अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि इस धार्मिक आयोजन में हिस्सा लेने से उन्हें आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की दिशा में नई अनुभूति मिली।

उनके अनुसार, यह विधान व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और जीवन के उद्देश्य को समझने के लिए प्रेरित करता है।

मंदिर परिसर में बना आध्यात्मिक माहौल

इंद्रध्वज मंडल विधान के स्वर्ण जयंती समारोह और 10 लक्षण महापर्व के चलते रायगंज स्थित जैन मंदिर में लगातार धार्मिक आयोजन हो रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु पूजा, आराधना, तप और स्वाध्याय में हिस्सा ले रहे हैं।

श्रद्धालुओं की मौजूदगी और लगातार चल रहे धार्मिक अनुष्ठानों से मंदिर परिसर में उत्साह और आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है।

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