ऑपरेशन सिंदूर के दौरान PAK की न्यूक्लियर साइट पर क्या हुआ? Tom Cooper ने किया स्पष्ट दावा।

मई 2025 में चले ऑपरेशन सिंदूर को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। ऑस्ट्रियाई सैन्य विश्लेषक और एरियल वॉरफेयर विशेषज्ञ टॉम कूपर ने एक इंटरव्यू में दावा किया है कि भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के संवेदनशील परमाणु ठिकाने किराना हिल्स पर प्रिसिजन स्ट्राइक की थी। उनके मुताबिक, “सबूत इतने साफ हैं जैसे पूरब में सूरज उगना।”


किराना हिल्स क्या है?

Kirana Hills, सरगोधा के पास स्थित एक अत्यंत संवेदनशील इलाका माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स और सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार यहां पाकिस्तान की परमाणु हथियार भंडारण से जुड़ी भूमिगत सुविधाएं, हार्डन्ड शेल्टर्स, गोला-बारूद डिपो और F-16 Fighting Falcon स्क्वाड्रन से संबंधित इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है।

कूपर का कहना है कि यह क्षेत्र पाकिस्तान के स्ट्रेटेजिक न्यूक्लियर प्रोग्राम का कोर हिस्सा है।


कूपर का दावा क्या है?

कूपर के अनुसार, 10 मई 2025 की अलसुबह भारतीय वायुसेना ने किराना हिल्स पर सटीक हमला किया। उनका दावा है कि:

  • पहले रडार स्टेशन को निष्क्रिय किया गया

  • फिर भूमिगत सुविधाओं के प्रवेश द्वारों को निशाना बनाया गया

  • हमले में Sukhoi Su-30MKISEPECAT Jaguar और Dassault Rafale जैसे प्लेटफॉर्म इस्तेमाल हुए

  • ब्रह्मोस, रैंपेज और स्कैल्प जैसी लंबी दूरी की मिसाइलों का उपयोग किया गया

कूपर का कहना है कि हमले का मकसद व्यापक तबाही नहीं, बल्कि “साफ रणनीतिक संदेश” देना था।


भारतीय वायुसेना का रुख

भारतीय पक्ष ने इन दावों से साफ इनकार किया है। एयर मार्शल ए.के. भारती ने कहा था कि ऑपरेशन में केवल आतंकी और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, किसी भी न्यूक्लियर साइट पर हमला नहीं हुआ। भारतीय वायुसेना का कहना है कि किराना हिल्स को टारगेट नहीं किया गया।


विवाद क्यों बढ़ा?

ऑपरेशन सिंदूर अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में शुरू हुआ था, जिसमें 26 नागरिकों की जान गई थी। भारत ने 7 से 10 मई के बीच पाकिस्तान और पीओके में कई आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की।

कूपर का दावा अगर सही माना जाए तो यह संकेत देता है कि भारत ने पाकिस्तान की रणनीतिक क्षमता को भी संदेश दिया। हालांकि आधिकारिक स्तर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है, जिससे यह मुद्दा अब भी विवाद और विश्लेषण का विषय बना हुआ है।

फिलहाल, एक तरफ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक के दावे हैं, तो दूसरी तरफ भारत का आधिकारिक इनकार—सच्चाई क्या है, यह अब भी स्पष्ट नहीं है।

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